ऐ मोमिनो हुसैन का मातम आख़ीर है
बज़्म अज़ाए किबलाए मातम अख़ीर है
शियों शहे अनाम का मातम अख़ीर है
हैं मजलिसें तमाम मुहर्रम अख़ीर है
उरयाँ है लाशा फ़ातेहे बद्र ओ हुनैन का
दे लो बतूल पाक को पुरसा हुसैन का
हाँ आशिकाने शाह उमम पीटो अपना सर
अशरा है आज और यह कयामत की है सहर
आलम के बादशाह का दुनिया से हैं सफर
उठते हैं ताजिये के चले शाहे बहर-ओ-बर
रुखसत है शह की अहले अज़ा बे हवास है
देखो तो कैसे ताज़िए खाने उदास हैं
वा हसरता इमाम गरीबां का कूच है
अफ़सोस है के दीन के सुल्तां का कूच है
रौनक के दिन चले शहे ज़ीशां का कूच है
रुख़सत करो हुसैन से मेहमा का कूच है
सदमा अजब तरह का दिल पर है जान पर
कैसी उदासी फैली हुई है जहान पर
ऐ नूरे चश्म दुख्तरे मुख्तार अलविदा
ऐ सैय्यादा बतूल के दिलदार अलविदा
ऐ उम्मते रसूल के गमख्वार अलविदा
ऐ हम से बेकसों के मददगार अलविदा
आहो बुका से हम कभी गाफिल न होएँगे
जब तक जियेंगे आपकी ग़ुरबत पर रोयेंगे
ऐ बे दयारो बे सरो-सामान अलविदा
ऐ बिन्ते मुस्तफ़ा के दिलो जान अलविदा
अहमद के बाग़ के गुले रेहान अलविदा
दस दिन के मोमिनों के मेहमान अलविदा
शिया निसार तेरे तन-ओ-पाश पाश के
बे कफ़न हुसैन फ़िदा तेरी लाश के
ऐ जिस्मो जानो हैदरे कर्रार अलविदा
ऐ शियाने दींन के सरदार अलविदा
सैय्यद ग़रीब बेकस ओ लाचार अलविदा
बे-ख्वाहिशो-बे बिरादर-ओ बेयार अलविदा
है है इमामबाड़ों को सुनसान कर चले
आक़ा तमाम हिन्द को वीरान कर चले
लो शाहे दीं के ताजियादारों करो बुका
मातम के दिन तमाम हुए वा मुसीबता
यारो विदा होता है मज़लूमे कर्बला
मेहमान दोपहर का है वो शाहे दो-सरा
अब मौत ले चली शाहे आली मुक़ाम को
रुखसत करो हुसैन अलैहिस सलाम को
सर पीटो मुहिब्बों हिन्द से आका का कूच है
रोओ के आज सैय्यदे वाला का कूच है
अफ़सोस हे के बेकस ओ तन्हा का कूच है।
हाँ शियों खाक उड़ाओ के मौला का कूच है
जी भर के रोने पाए न मातम हुआ अख़ीर
आशूर का भी रोज़ मुहर्रम हुआ अख़ीर
किस तरह आये ताजियादारों के दिल को चैन
हर सिम्त रूहे फ़ातिमा करती है रो के बैन
कुर्बान तेरी लाश के ज़हरा के नूरे ऐन
कैसे बयां हो बेकसी ऐ शाहे मशराकैंन
मोहताज गोर, गर्म ज़मीन पर पड़ा रहा
चालीस रोज़ दश्त में बे-सर पड़ा रहा
वो दिन की धुप रात की वो ओस हे सितम
वोह कंकड़ों का फर्श वो मैदाने दर्दो ग़म
और गर्म गर्म झोकों का चलना वो दम ब-दम
इस दुख पर सारबां ने किया हाथ भी कलम
सदमे गुज़र गए यह तने चाक चाक पर
है है यह आसमान न गिरा फट के खाक पर
लो यारो अब हुसैन की रुखसत का रोज़ है।
हैदर के नूरे ऐन की रुखसत का रोज़ है
जहरा के दिल के चैन की रुखसत का रोज़ है
सुलताने मशराक़ैन की रुखसत का रोज हे
फिर कर्बला की सिम्त शहे कर्बला चला
हादी चला ईमाम चला पेशवा चला
सिब्ते नबी की मजलिस-ओ-मातम तमाम है
इब्ने अली की मजलिस-ओ-मातम तमाम है
हक के वली की मजलिस-ओ-मातम तमाम है
रुए सखी की की मजलिस-ओ-मातम तमाम है
आइन्दा साल तक जो कोई ज़िन्दा होयेगा
फिर वो शरीक होके मुहर्रम में रोएगा
बस ये ज़रीह होगी न होगा ये अलम
ये मजलिसें ये सोहबतें घर घर से होगी कम
मिम्बर को खाली देख के होयेगा दिल में ख़म
ये दिन वो हैं की क्रत्ल हुए हैं शहे उमम
अब ताज़िया उठता है हर इक ख़ाक उड़ाएगा
अब तो इमामबाड़ों में जाया न जाएगा
रोओ मोहिब्बो आज के रिक्रक़त का रोज़ है
सिब्ते नबी की आज शहादत का रोज़ है।
सर पर उड़ाओ ख़ाक कयामत का रोज़ हे
मजलूम-ओ-तशना लब पे मुसीबत का रोज़ मातम तुम्हारे आका का यारों तमाम है
मेहमान कोई दम कोई साअत ईमाम है
अशरे का दिन है आज मोहिब्बाने बावफ़ा
खंजर से ज़िबह हो गए सुल्ताने कर्बला
लाजिम है आज तुम को करो गिरया-ओ-बुका
जलती ज़मीन पर तने उरयाँ पड़ा रहा
गुस्ल-ओ-कफ़न दिया न तने पाश पाश को
गाड़ा किसी ने आके न सेय्यद की लाश को
ऐ मोमिनों हुसैन की रेहलत का वक़्त है
ऐ यारों तुम से शाह की रुख़सत का वक़्त है
लुटने का फ़ातमा की रियाज़त का वक़्त है
आका की ये तुम्हारे शहादत का वक्त है
तुर्बत में जाके ज़ेर-ओ-ज़मीन गर न सोयेंगे
फिर अगले साल अशरे में हज़रत को रोयेंगे
रोलो अज़ीज़ो फिर कहाँ तुम और ये दिन कहाँ
अगले बरस जो ज़िन्दा थे हैं ख़ाक में निहाँ
क्या एतेमाद ज़ीस्त का दुनिया के दरमियां
पैके अजल से दहर में मिलती है कब अमाँ
काहे को इस सवाब को हाथों से खोओ तुम
आइन्दा साल हो के न हो खूब रोओ तुम
या रब जहां में नज़्म-ए-रियाज़त हरा रहे
गुलशन सदा गुलों से ये फूला फला रहे
अहले अज़ा पे साया-ए-मुश्किल कुशा रहे
दामन गुले उम्मीद से हर दम भरा रहे
इसे नज़्म का अनीस तुझे फिर सिला मिले
सदक़े से पंजतन के हो जो मद-दोआ मिले